हिंदू होने के बावजूद करुणानिधि को दफनाया गया, दाह संस्कार नहीं करने के पीछे ये है वजह

द्रविड़ राजनीति में 6 दशकों तक अपना सिक्का कायम रखने वाले एम करुणानिधि को चेन्नई के मरीना बीच पर अन्नादुरई की समाधि के पास दफ्न कर दिया गया। ऐसे में सवाल ये कि आखिर करुणानिधि को दफनाया क्यों गया? उनका दाह संस्कार क्यों नहीं किया गया? तो इसका जवाब तमिलनाडु के इतिहास के गर्भ में छिपा है।

इतिहास के पन्नों को पलटते हुए जब आप द्रविण आंदोलन के अध्याय को पढ़ेंगे तो करुणानिधि को दफनाने का माजरा आपको समझ में आएगा। दरअसल द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध में हुई थी। और यही वजह है कि इस आंदोलन के चलते तमिलनाडु के लोगों ने हर उस व्यवस्था को मानने से इनकार कर दिया जिसकी परंपरा ब्राह्मणवाद से जन्म लेती है।

मद्रास विश्वविद्यालय में तमिल भाषा और साहित्य के रिटायर्ड प्रोफेसर वी अरासु ने बीबीसी उर्दू को दिए इंटरव्यू में बताया था कि इन नेताओं का द्रविड़ आंदोलन से जुड़ा होना ही इसका सबसे बड़ा कारण है। इस आंदोलन से जुड़ा कोई भी नेता उनकी जाति बताने वाले उपमान का इस्तेमाल नहीं करते हैं। साथ ही द्रविड़ आंदोलन में हिस्सा लेने वाले नेताओं का हिंदू धर्म के किसी भी ब्राह्मणवादी परंपरा में विश्वास नहीं है। यही वजह है कि दाह संस्कार के बजाय द्रविण नेताओं को दफनाया जाता है।

एक दौर था जब ब्राह्मणवादी परंपरा और व्यवस्था द्रविड़ों के लिए जी का जंजाल हुआ करती थी। परंपरा की आड़ में जब द्रविड़ों को सताया गया, उन्हें मजबूर किया गया तो दबे कुचले द्रविड़ों ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ जंग छेड़ दी। बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय के मुताबिक, जब द्रविड़ आंदोलन अपने शबाब पर था तब वहां बहुत से मंदिर तोड़ दिए गए। मंदिरों के साथ ही उन ब्राह्मणवादी परंपराओं को भी द्रविड़ों ने मिटा दिया। दाह संस्कार भी उन्हीं परंपराओं में से एक था, जिसे लोगों ने मानना बंद कर दिया।

एक सवाल और अपके जहन में यह उठता होगा कि आखिर दक्षिण भारत में लोग नेताओं को भगवान की तरह क्यों पूजते हैं। आखिर क्या वजह है कि जब उनके नेता अस्पातल में भर्ती हो जाते हैं तो दिन रात लोग अस्पताल के बाहर खड़े रहते हैं। भगवान से प्रर्थना करते हैं। इसका जवाब भी द्रविण आंदोलन के गर्भ में छिपा है।

पत्रकार मधुकर उपाध्याय के अनुसार, द्रविड़ आंदोलन के दौरान जब मंदिर तोड़ दिए गए। ब्राह्मणवाद को मिटा दिया गया तो लोगों की जिंदगी में भगवान की जगह खाली हो गई, और ऐसे में लोगों ने वहां के नेताओं और कलाकारों को अपना भगवान मान लिया और वहां पर उनके मंदिर नजर आने लगे। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री को व्यक्ति पूजा का आदर्श कहा जा सकता है। और यही वजह है कि राज्य में किसी भी देवी-देवता की तरह ही उनकी भी पूजा होती है, और उनके नाम पर बने मंदिरों में श्रद्धालुओं जनसैलाब उमड़ता है।

आपको याद होगा तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता को भी दफनाया गया था। दरअसल करुणानिधि और जयललिता, दोनों ही नेता द्रविड़ आंदोलन का हिस्सा रहे थे। जयललिता ने अपने राजनीतिक गुरु और तमिल अभिनेता एमजी रामाचंद्रन के निधन के बाद पार्टी की कमान संभाली थी। रामाचंद्रन को भी उनके निधन के बाद दफ्न किया गया था। उनकी समाधि के पास ही द्रविड़ आंदोलन के बड़े नेता और डीएमके संस्थापक अन्नादुरई की भी समाधि है।

इसी परंपरा के तहत ही करुणानिधि को भी वहीं दफ्न करने की मांग की गई थी, जिसे तमिलनाडु सरकार ने मानने से इनकार कर दिया था। लेकिन मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के बाद आखिरकार करुणानिधि को मरीना बीच पर ही दफनाया गया और उनकी समाधि बनाई गई।

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