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दिल्ली का पुनर्वास मॉडल सवालों के घेरे में, क्या गरीबों को शहर से बाहर धकेला जा रहा है?

दिल्ली में झुग्गी बस्तियों को हटाकर लोगों को पुनर्वास स्थलों पर भेजने की प्रक्रिया पर एक विस्तृत रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। “हाशिये पर धकेले गए लोग: भारत में पुनर्वास की त्रासदी” नाम की इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नगला माची, लक्ष्मी नगर, खान मार्केट, यमुना पुश्ता और दूसरी बस्तियों से हटाए गए कई परिवारों को पर्याप्त जानकारी, तैयारी और बुनियादी सुविधाओं के बिना सावदा घेवरा जैसे पुनर्वास स्थलों पर भेजा गया। रिपोर्ट के अनुसार इस प्रक्रिया का असर सिर्फ घर बदलने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों की नौकरी, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजमर्रा की जिंदगी तक पर पड़ा।

यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब दिल्ली में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए कई झुग्गी क्लस्टर्स को प्राथमिकता के आधार पर हटाने और पुनर्वास की प्रक्रिया तेज किए जाने की चर्चा है। ऐसे में सावदा घेवरा जैसे पुराने पुनर्वास मॉडल पर उठे सवाल फिर बहस के केंद्र में आ गए हैं। रिपोर्ट यह सवाल खड़ा करती है कि क्या राजधानी में विकास परियोजनाओं की कीमत सबसे कमजोर तबके को शहर के किनारों पर धकेलकर चुकाई जा रही है।

‘लोगों को बताया तक नहीं गया कि कहां भेजा जा रहा है’

रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में लोगों को यह तक स्पष्ट नहीं था कि उन्हें आखिर कहां बसाया जाएगा। करीब 93 प्रतिशत लोगों ने कहा कि पुनर्वास से पहले उनसे कोई राय नहीं ली गई, जबकि लगभग 99 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें नई जगह पहले से दिखाई तक नहीं गई थी। लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें पुनर्वास स्थल की वास्तविक स्थिति, रोजगार के अवसरों और बुनियादी सुविधाओं के बारे में पहले से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। कई परिवारों ने पानी की कमी और खराब हालात को लेकर डर जताया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई परिवारों को सिर्फ इतना बताया गया कि उन्हें पश्चिमी दिल्ली के मुंडका से आगे सावदा घेवरा इलाके में बसाया जाएगा। कई लोगों ने दावा किया कि वे नई जगह के बारे में पूरी तरह अनजान थे और उन्हें वहां के हालात, रोजगार या आसपास के माहौल की कोई जानकारी नहीं थी। कुछ परिवारों ने यह भी कहा कि उन्हें डर था कि नई जगह पर स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

‘56% लोगों को नोटिस नहीं मिला, कुछ को सिर्फ 8 घंटे पहले जानकारी’

रिपोर्ट के अनुसार करीब 56 प्रतिशत लोगों को घर हटाए जाने से पहले कोई औपचारिक नोटिस नहीं मिला। कई लोगों ने कहा कि उन्हें सिर्फ मौखिक सूचना दी गई या फिर पड़ोसियों और स्थानीय लोगों से जानकारी मिली। रिपोर्ट में टैगोर गार्डन का उदाहरण देते हुए दावा किया गया है कि कुछ परिवारों को कथित तौर पर केवल आठ घंटे पहले जानकारी दी गई थी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई इलाकों में हटाने की कार्रवाई अचानक हुई, जिससे लोग अपना सामान तक ठीक से नहीं निकाल सके। लगभग 89 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कार्रवाई से पहले कोई सरकारी अधिकारी या जनप्रतिनिधि मौके पर नहीं आया। रिपोर्ट इसे जवाबदेही और संवाद की गंभीर कमी से जोड़ती है।

रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र (UN) के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए कहती है कि विस्थापन से पहले प्रभावित लोगों को लिखित सूचना, पर्याप्त समय और पुनर्वास प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक जमीनी स्तर पर इन मानकों का पालन नहीं हुआ।

बच्चों की पढ़ाई टूटी, इलाज छूटा और दस्तावेज तक खो गए

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कई इलाकों में तोड़फोड़ की कार्रवाई स्कूल परीक्षाओं और त्योहारों के दौरान की गई। खान मार्केट और हरिश्चंद्र माथुर लेन जैसे इलाकों के कई बच्चों की परीक्षाएं प्रभावित हुईं। रिपोर्ट के मुताबिक खान मार्केट में कार्रवाई महाशिवरात्रि के दिन हुई थी, जब कई लोग व्रत पर थे।

रिपोर्ट के अनुसार लगभग 50 प्रतिशत लोगों का घरेलू सामान टूट गया या नष्ट हो गया। करीब 75 प्रतिशत परिवारों ने दावा किया कि उनके जरूरी दस्तावेज- जैसे राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र और मेडिकल रिकॉर्ड- खो गए। लगभग 15 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनका लगभग पूरा सामान खत्म हो गया, जबकि कुछ परिवारों ने पशुओं के खोने या मरने की भी जानकारी दी।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि विस्थापन का सबसे गहरा असर स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार पर पड़ा। जिन अस्पतालों, क्लीनिकों और काम की जगहों तक लोग पहले आसानी से पहुंचते थे, पुनर्वास के बाद वह व्यवस्था टूट गई। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कुछ परिवारों ने इलाज छूटने और नियमित चिकित्सा सेवाएं बाधित होने की शिकायत भी की।

विकास बनाम विस्थापन की नई बहस

रिपोर्ट अब दिल्ली के पुनर्वास मॉडल और शहरी विकास की दिशा को लेकर नई बहस खड़ी कर रही है। एक तरफ सरकार और एजेंसियां बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए पुनर्वास को जरूरी बता रही हैं, वहीं दूसरी तरफ यह रिपोर्ट दावा करती है कि पिछले पुनर्वास मॉडल में लोगों की सहमति, सम्मान, रोजगार और बुनियादी अधिकारों की अनदेखी हुई।

रिपोर्ट यह संकेत देती है कि पुनर्वास सिर्फ घर बदलने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि कई परिवारों के लिए शहर, काम, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से कट जाने की शुरुआत बन गई। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास परियोजनाओं और विस्थापन के बीच संतुलन बनाने में व्यवस्था अब भी कमजोर तबके की आवाज सुनने में नाकाम हो रही है?

Adil khan

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