उत्तराखंड पहुंचे जापानी पर्यटकों ने रचा इतिहास, जानें ऐसा क्या कर दिया

आठ सदस्यीय जापानी दल ने समुद्र तल से 4600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सतोपंथ झील में पहुंचकर इतिहास रच दिया।

यह पहला मौका है, जब कोई दल घोड़े-खच्चरों के साथ सतोपंथ पहुंचा है। इस दल ने वहां पहुंचकर न केवल प्रकृति का नजदीक से दीदार किया, बल्कि हवन भी किया। हैरत की बात यह है कि इस दल के साथ कोई पोर्टर भी नहीं था। स्थानीय निवासियों सहित टूर आपरेटरों का दावा है कि इस यात्रा मार्ग पर आज से पहले कभी भी कोई पर्यटक या श्रद्धालु दल घोड़े-खच्चर के साथ नहीं गया था। जापानी ट्रैकर हीरो ने कहा कि वह दुनिया घूम चुके हैं, परंतु यह इकलौता स्थान है जहां हमें ईश्वरीय अहसास हुआ तथा आध्यात्मिक शांति मिली।

बदरीनाथ धाम से सतोपंथ की यात्रा दुर्गम मानी जाती है। इस ट्रैक पर एक भी गांव नहीं है। बदरीनाथ धाम से आगे माणा गांव से 24 किमी पैदल निर्जन पड़ावों से होती हुए जाने वाली इस यात्रा का धार्मिक व पर्यटन के लिहाज से खास महत्व है। इस यात्रा में तीन पड़ावों में सतोपंथ पहुंचा जाता है, जबकि दो दिन वापसी में लगते हैं।

मान्यता है कि इस रास्ते पांडव स्वर्ग गए थे। सतोपंथ से तीन किलोमीटर आगे स्वर्गारोहणी ग्लेशियर है। धार्मिक मान्यता के अनुसार आज भी इस ग्लेशियर में सीढ़ी देखी जा सकती है, जिसे स्वर्गारोहणी मार्ग कहते हैं। सतोपंथ झील के पास ही अलकापुरी ग्लेशियर है, जहां से अलकनंदा निकलती है। ग्रांट एडवेंचर जोशीमठ के सीईओ राजेंद्र सिंह मार्तोलिया ने बताया कि कोलकाता के सात व जापान के आठ पर्यटकों के संयुक्त ट्रैकिंग अभियान में इस दल ने पांच दिनों में यह ट्रैक सफलतापूर्वक पूरा किया।

इस अभियान में पहली बार पोर्टर के बजाय घोड़े व खच्चरों को ले जाया गया था, जो सफल रहा। इस अभियान दल के गाइड दिनेश सिंह राणा ने बताया कि यह पहली बार हुआ है कि इस ट्रैक पर पोर्टर की जगह घोड़े का प्रयोग किया गया।

सतोपंथ को लेकर मान्यता है कि यह तिकोनी झील होने के चलते यहां पर ब्रह्मा, विष्णु महेश स्नान करते हैं। जापानी पर्यटकों ने इस झील के किनारे हवन भी किया। कोविड के बाद इस ट्रैक पर पहला विदेशी दल गया है। पर्यटकों ने बसुधारा, चक्रतीर्थ सहित अन्य धार्मिक महत्व के स्थल भी देखे।

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