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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 7 साल की सजा रद्द कर पति को किया बरी, कहा- ‘संदेह सबूत नहीं होता’

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने खुदकुशी से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले में ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि “संदेह चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।” यह टिप्पणी 2004 में उधमसिंह नगर जिले के खटीमा क्षेत्र में हुई एक आत्महत्या से जुड़े मामले में सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ दायर आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान की गई।

2004 की घटना और आरोप

मामला 15 सितंबर 2004 का है। अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक की पत्नी ने अपने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या का कोई संकेत नहीं मिला।

आरोप यह था कि पति को अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह था और उसने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। अभियोजन पक्ष का कहना था कि इसी मानसिक दबाव के कारण महिला ने आत्मघाती कदम उठाया।

सत्र अदालत का फैसला

उधमसिंह नगर की सत्र अदालत ने आरोपी को दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया था। हालांकि, अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के सश्रम कारावास और दस हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में क्या उठे सवाल

सत्र अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे या उत्तेजना का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। न तो कोई आत्महत्या नोट मिला और न ही ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने आया, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया।

अपील में यह भी कहा गया कि वैवाहिक विवाद या चरित्र पर संदेह को स्वतः ‘उकसावा’ नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट की टिप्पणी और निर्णय

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल परिस्थितिजन्य संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय प्रमाण आवश्यक होते हैं।

सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सत्र अदालत का फैसला रद्द करते हुए अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया।

कानूनी दृष्टि से महत्व

यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली के उस मूल सिद्धांत को दोहराता है, जिसके तहत संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाता है। अदालत ने यह संकेत दिया कि किसी भी व्यक्ति को केवल आशंका या वैवाहिक तनाव के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों।

Ram Yadav

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