उत्तराखंड देवों की भूमि है। यहां दूसरे प्रदेशों की तुलना में कहीं ज्यादा मंदिर है और हर मंदिर की अपनी खासियत है। कुछ के अपने रहस्य भी।
इसी तरह का एक मंदिर चमोली जिले में है। इसे गोपेश्वर मंदिर कहते हैं। इसे गोस्थल के रूप में भी जाना जाता है। मान्यता है कि पश्वीश्वर महादेव देवी पार्वती के साथ मंदिर में वास करते हैं। बद्रीनाथ के धर्माधिकारी भुवनचंद्र उनियाल के मुताबिक स्कंदपुराण के केदारखंड में इस तीर्थ के बारे में बताया गया है।
इस मंदिर में एक त्रिशूल वो हैरान करने वाला है। अगर ताकत के साथ इस त्रिशूल को हिलाने की कोशिश की जाए तो वो बिल्कुल भी कंपित नहीं होगा, लेकिन भक्ति के साथ कनिष्ठ उंगली (हाथ की सबसे छोटी उंगली) से छुआ जाए तो त्रिशूल में बार-बार कंपन होता है।
ऐसा कहा जाता है कि महादेव ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को इसी जगह पर भस्म कर दिया था। इसीलिए शिवजी को इस क्षेत्र में झषकेतुहर भी कहा जाता है। इसी जगह पर भगवान शिवजी का नाम रतीश्वर भी पड़ा, क्योंकि कामदेव के भस्म होने के बाद कामदेव की पत्नी रति ने यहां एक कुंड के निकट घोर तप किया और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि कामदेव प्रद्युम्न के रूप में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र बनकर जन्म लेंगे और वही तुम्हारी उनसे भेंट होगी। जहां रति ने तप किया, उस कुंड का नाम रतिकुंड पड़ा। जिसे वैतरणीकुंड भी कहा जाता है। द्वारिका में प्रद्युम्न के रूप में कामदेव का जन्म होता हैं और मायावती के रूप में रति का भी पुनर्जन्म होता है।
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