उत्तराखंड: आजाद हिंद फौज के जांबाज की कहानी उन्हीं की जुबानी

देश आज आजादी की 74वीं वर्षगांठ मना रहा है। पूरा देश आजादी के इस पर्व के मौके पर जश्न में सराबोर है। हर कोई आजादी के लिए मर मिटने वाले वीर सपूतों को याद कर रहा है।

इस दिन कुछ ऐसे भी भारत माता के सपूत भी हैं जो आज अपने उस दौर को याद कर रहे हैं, जब उन्होंने देश की आजादी अंग्रेजों से लोहा लिया। उन्हीं में से एक हैं 103 के वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बख्तावर सिंह बिष्ट। उत्तराखंड के चमोली के रहने वाले बिष्ट आज भी जिंदा हैं। आज भले से शरीर उनका बूढ़ा हो गया है, लेकिन उनके मन मे देश के प्रति जोश और जज्बा कम नही हुआ है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के युवाओं से अपील की कि बड़ी तादाद में युवा सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करें।

बख्तावर सिंह का सफर

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बख्तावर सिंह बिष्ट का जन्म चमोली के श्रीकोट गांव में 18 जनवरी 1918 को हुआ था। बचपन से ही मन में देश की आजादी का सपना संजोए बख्तावर सिंह ने साल 1940 में गढ़वाल राइफल में भर्ती हुए। सेना में भर्ती होने के 5 साल बाद उन्होंने 1945 में ब्रिटिश सेना से बगावत की और नेता सुभाष चंद्र बोस की सेना INA में शामिल हो गए। बख्तावर सिंह बताते हैं कि जब अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जब उन्होंने लड़ाई लड़ी तब उन लोगों के पास हथियार भी ना के बराबर हुआ करते थे। वो आगे बताते हैं कि एक तरफ अंग्रेजी सरकार थी और दूसरी ओर वो लोग थे। वो कहते हैं कि अब आप अंदाजा लगा सकते है कि हमने किन परिस्थितियों में अंग्रेजो से लड़ाई लड़ी होगी।

अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई

वो आगे बताते हैं कि लड़ाई के दौरान ब्रिटिश सरकार ने उन्हें एक साल तक कलकत्ता की जेल में भी बंद कर दिया था। देश की आजादी के लिए ब्रिटिश सरकार से बगावत करने के आरोप में 1946 में फ़ौज से हटा कर घर भेज दिया गया। धीरे-धीरे देश की आजादी के लिए आवाज बुलंद होती गयी नतीजन ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चन्द्र बोस की सेना के आगे घुटने टेक दिए जिसके बाद सन 1947 में देश अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो गया। देश की आजादी के बाद बख्तावर सिंह साल 1948 में पीएससी में भर्ती हुए और 27 साल पीएसी की सेवा करने के बाद रिटायर हुए।

जितेंद्र पवार की रिपोर्ट

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