फोटो: सोशल मीडिया
देवभूमि के कारीगरों का हुनर ही है ये कि आज से तकरीबन 350-400 साल पहले जो मकान बना दिये वो आज भी उसी मजबूती के साथ खड़ा है।
पहाड़ों पर रहना जितना मुश्किल है। पहाड़ी इलाकों में अपनी जरूरतों के हिसाब से घर बनाना उससे भी ज्यादा मुश्किल। लेकिन देवभूमि के कारीगरों का हुनर ही है ये कि तकरीबन 350-400 साल पहले जो मकान बना दिये वो आज भी उसी मजबूती के साथ खड़ा है। इन मकानों को देखकर आज के दौर के आर्टिकेक्ट भी हैरत में पड़ जाते हैं कि आखिर उस जमाने में जब टेक्नोलॉजी भी एडवांस नहीं थी। उस दौर में भी पहाड़ों पर इतना मजबूत घर कैसे बना दिया। उत्तरकाशी जिले के सीमांत क्षेत्रों में आप जाएंगे, तो आपको ये बिल्डिंग आज भी उसी शान से खड़ी मिलेंगी।
यहां की सभ्यता कितनी पुरानी है, इसका अंदाजा आपने तस्वीर को देखकर ही लगा लिया होगा। यमुना घाटी के कोट बनाल गांव में सबसे पुराना भवन मौजूद है और आपको हैरानी होगी कि अद्भुद कारीगरी से बना ये भवन 5 मंजिला है। स्थानीय भाषा में इसे पंचपुरा कहते हैं। ये मकान कई भूकंप को झेलने के बाद भी ऐसे ही खड़ा है। जब 1991 में इस घाटी में भूकंप आया था, तो गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर में पुरातत्व विभाग के पूर्व प्रोफेसर स्व. प्रदीप सकलानी कोटी गांव में गए थे। वहां पंचपुरा भवन का सर्वे किया था। इस भवन की कॉर्बन डेटिंग कराई गए तो पता चला कि ये 350 से 400 साल पुराना है।
रवांई घाटी के सौ से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां इसी तरह बिल्डिंग बनाया गया है। दो मंजिल वाली बिल्डिंग को दोपुरा, तीन मंजिल वाली बिल्डिंग को तिपुरा, चार मंजिल वाले भवन को चौपुरा और पांच मंजिल वाले भवन को पंचपुरा कहा जाता है। इन बिल्डिंग को आसान से आयाताकार आर्किटेक्चर के जरिए शानदार रूप दिया जाता था। इनकी ऊपरी मंजिल में शौचालय और स्नानागार जैसी व्यवस्थाएं की गई।
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