नैनीताल के रामगढ़ स्थित कुमाऊं विश्वविद्यालय के महादेवी वर्मा सृजन पीठ में शोकसभा आयोजित कर कवि और लेखक मंगलेश डबराल श्रद्धांजलि दी गई।
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के वरिष्ठ डबराल महादेवी वर्मा सृजन पीठ कार्यकारिणी के सदस्य भी थे। पीठ से उनका आत्मीय लगाव था। वो साल 2009, 2013, 2016 में दो-दो बार और अंतिम बार वर्ष 2018 में पीठ के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। पीठ कार्यकारिणी में उनका कार्यकाल अप्रैल, 2021 तक था।
कवि डबराल से जुड़ी स्मृतियों को याद करते हुए महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य ने कहा कि मंगलेश जी का अचानक यूं चले जाना स्तब्ध करने वाला है। उनमें सौम्यता के साथ क्रांति की ऊष्मा और बदलाव के लिए कोमलता भरी जिद्द का अद्भुत मेल था। राजनीति में बदलते धर्म, पाशविक होते इंसान और आदमी को निगलते बाजार का विरोध उन्होंने बहुत संतुलित तरीके से विरोध किया है।
डबराल उन दुर्लभ लेखकों में से एक हैं जिन्होंने गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में शानदार लेखन किया है। उनके अनुसार, वर्तमान में युवा पीढ़ी और नवलेखकों में वे सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले साहित्यकार थे। उनकी कविता की पंक्ति ‘जहां तहां जो भी बिखरा था शोर की तरह, उसे ही मैं लिखता रहा संगीत की तरह’ एक तरह से उन्हीं का जीवन दर्शन है।
पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने कहा कि श्री डबराल समकालीन हिंदी कवियों में सबसे चर्चित नाम है। खुद की ही तरह अपनी बेहद शांत रचनाओं से व्यवस्था को झकझोरने वाले श्री मंगलेश जी अपने पीछे कविताओं का ऐसा संसार छोड़ गए हैं, जो उनकी याद दिलाता रहेगा। डबराल की कविताओं में एक अजब सी खामोशी थी। ये खामोशी अंतर्मन को चीरती थी। व्यवस्थाओं से सवाल करती थी। पहाड़ पर जलती यह लालटेन अपने शब्दों से पाठकों को होशियार और खबरदार भी करती थी। शोकसभा में पीठ कर्मी बहादुर सिंह कुंवर, भैरव सिंह आदि शामिल थे।
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