कोरोना काल में हर तरफ बुरी खबर ही सुनने को मिल रही है। हर बढ़ते दिन के साथ कोरोना वायरस और भयावह होता जा रहा है।
जिसकी वजह से आर्थिक समेत दूसरे मोर्चे पर लोगों की हालत खराब होती जा रही है। कोरोना की वजह से सब कुछ खराब हो रहा है, ऐसा भी नहीं है। कोरोना महामारी के इस दौर में जिस तरह कारखाने बंद हुए और सड़कों पर गाड़ियों की तादाद कम हुई उसकी वजह से पॉल्युशन में काफी कमी आई, जिसका सबसे ज्यादा फायदा पर्यवावरण को रहा है। साथ ही प्रदूषण की वजह से लोगों को होने वाली बीमारियों में भी कमी आई है।
कोरोना पैंडेमिक में पहाड़ी इलाकों के पर्यवारण में काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पर्यवारण में काफी बेहतर बदलाव देखने को मिल रहा है। इसी बदलाव पर शोध भी शुरू हो गया है। अल्मोड़ा का गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान भी शोध में जुट गया है। संस्थान के निदेशक आरएस रावल का कहना है कि कोरोना काल के शुरू होने के साथ ही देश-दुनिया में कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है। पर्यावरण में कार्बन की मात्रा में कमी का असर हिमालयी क्षेत्रों के ग्लेशियरों के साथ ग्लोबल वार्मिंग पर निश्चित तौर पर पड़ा है।
रावल ने कहा कि विश्व के कई बड़े संस्थान कोरोना के दौरान वैश्विक गतिविधियों पर शोध कर रहे हैं। इसी क्रम में गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान भी हिमालय क्षेत्रों में कोरोना के दौरान आंकड़े जुटाने में जुटा है। पूरी रिसर्च और विश्लेषण के बाद दुनिया के सामने कोरोना के दौरान कार्बन उत्सर्जन में कमी से वातावरण और वनस्पितियों पर प्रभाव सामने आयेगा।
अल्मोड़ा से हरीश भंडारी की रिपोर्ट
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