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बिहार वोटर वेरिफिकेशन में चुनौतियां: झुग्गी बस्ती के गरीबों का मत अधिकार खतरे में?

बिहार में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पटना की झुग्गी बस्तियों में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार के नियम और प्रक्रियाएं सबसे कमजोर और वंचित तबके को मतदान के अधिकार से वंचित कर सकती हैं। उनका आरोप है कि ये प्रक्रियाएं गरीबों और अनपढ़ों के लिए इतनी जटिल हैं कि उनके नाम वोटर लिस्ट से कटना आसान हो गया है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, पटना की कई झुग्गी बस्तियों में ऐसे लोग रहते हैं जिनके माता-पिता काम की तलाश में दूर-दराज के गांवों से आकर यहीं बस गए थे। ये लोग दशकों से इन्हीं बस्तियों में रह रहे हैं, और यही उनकी पहचान और जीवन का केंद्र है। लेकिन अब वोटर वेरिफिकेशन की प्रक्रिया उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।

प्रक्रिया की जटिलता और पहुंच का अभाव:

सरकार का निर्देश है कि मतदाता बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) से फॉर्म लें और उसे भरकर जमा करें। बीएलओ को घर आकर फॉर्म देना है। हालांकि, जमीनी हकीकत कुछ और है।

समझ और सहायता का अभाव: झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले कई लोग फॉर्म को समझ नहीं पाते और उन्हें भरने में मदद की जरूरत होती है। क्या हर बीएलओ सबकी मदद कर पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।

पहुंच की समस्या: जो लोग सुबह काम पर जाते हैं और रात को लौटते हैं, उनके लिए बीएलओ से मिलना मुश्किल हो जाता है।

ऑनलाइन प्रक्रिया की चुनौती: “ऑनलाइन भर लो” जैसा सुझाव नोटबंदी के समय के “डिजिटल भुगतान” की याद दिलाता है। अधिकांश झुग्गीवासी भले ही मोबाइल चला लेते हों, लेकिन वेबसाइट पर जाकर फॉर्म भरना, ईमेल बनाना, दस्तावेज अपलोड करना और गलती होने के डर के बिना यह सब करना उनके लिए आसान नहीं है।

एक ताजा घटना का जिक्र करते हुए एक कम्युनिटी मोबिलाइजर ने बताया कि पटना के दानापुर क्षेत्र की सबरी नगर बस्ती में बीएलओ आए, लेकिन एक दंपति को फॉर्म नहीं दिया। ऑनलाइन जांच करने पर पत्नी का फॉर्म तो मिला, पर पति का नहीं। 2003 की वोटर लिस्ट में भी पति का नाम नहीं था। बीएलओ से बात करने की कोशिश की गई तो वह जा चुके थे। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब बीएलओ फॉर्म नहीं दे रहे और ऑनलाइन भी नाम नहीं दिख रहा, तो जिम्मेदारी किसकी है?

दस्तावेजों की अनुपलब्धता: मतदाता वेरिफिकेशन के लिए मांगे जा रहे कई दस्तावेज झुग्गी बस्ती के लोगों के पास उपलब्ध नहीं हैं:

सरकारी कर्मचारी/पेंशनभोगी पहचान पत्र: झुग्गीवासियों के पास ऐसे दस्तावेज नहीं होते।

1 जुलाई 1987 से पूर्व निर्गत कोई सरकारी दस्तावेज: यह उन लोगों के लिए है जो बहुत पहले से काम कर रहे थे, लेकिन झुग्गियों में यह लगभग असंभव है।

जन्म प्रमाण पत्र: अधिकतर लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं होता। इसे बनवाने में भी भारी मशक्कत और पैसे लगते हैं (जैसे एक CSC केंद्र पर ₹2200 की मांग)।

पासपोर्ट/मैट्रिक या शैक्षणिक प्रमाण पत्र: ये दस्तावेज झुग्गी बस्ती के लोगों के पास शायद ही पाए जाते हैं क्योंकि शिक्षा का स्तर कम है और पासपोर्ट की जरूरत नहीं होती।

स्थायी निवास प्रमाण पत्र: जब निवास ही अस्थायी है, तो स्थायी प्रमाण पत्र कहाँ से लाएं? CSC केंद्रों पर इसके लिए भी पैसे मांगे जाते हैं।

वन अधिकार/NRC/पारिवारिक रजिस्टर/भूमि/मकान आवंटन प्रमाण पत्र: इनमें से अधिकांश दस्तावेज झुग्गीवासियों पर लागू नहीं होते या उनके पास इनकी जानकारी नहीं होती, क्योंकि उन्हें न जमीन का पट्टा मिला है, न मकान का अधिकार।

जाति प्रमाण पत्र (SC/OBC/ST): कुछ लोगों ने बनवाया है, लेकिन ऑनलाइन प्रक्रिया और एजेंटों द्वारा पैसे (₹300-₹500) की मांग इसमें भी बाधा बनती है।

समाधान की आवश्यकता: सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस समस्या के समाधान के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:

  • हर बस्ती में सरकार द्वारा नामित सहायता केंद्र/काउंटर स्थापित किए जाएं।
  • सभी दस्तावेज मुफ्त में या नाममात्र शुल्क पर बनाए जाएं।
  • बीएलओ को संवेदनशील होकर काम करने का प्रशिक्षण दिया जाए।
  • समुदाय से स्थानीय स्वयंसेवकों को इस प्रक्रिया में जोड़ा जाए।
  • सबसे महत्वपूर्ण, इस पूरी प्रक्रिया को जनहित में सरल बनाया जाए, ताकि भय और भ्रम फैलाकर लोगों को सिस्टम से बाहर न किया जाए।

निष्कर्ष में, “नियम सबके लिए है, लेकिन जिम्मेदारी भी सबकी होनी चाहिए।” लोकतंत्र में हर नागरिक की भागीदारी ज़रूरी है, और वोटर लिस्ट में नाम होना उसका पहला अधिकार है। यदि कमजोर तबके को इस अधिकार से वंचित किया जाता है, तो यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ होगा।

(यह लेख ज़हीब अजमल द्वारा मुहैया कराई गई जानकारी के आधार पर लिखा गया है, जो पटना में समर चेरिटेबल ट्रस्ट के साथ झुगी बस्तियों में शिक्षा और लोगों के अधिकार पर काम करते हैं।)

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