उत्तराखंड स्पेशल: तपोवन में तबाही की इनसाइड स्टोरी, फरवरी में ग्लेशियर क्यों फटा?

ऋषिगंगा घाटी में तबाही क्यों आई, इसका सटीक जवाब देना बहुत मुश्किल है, लेकिन कई वैज्ञानिकों की थ्योरी कहती है ग्लेशियर के टूटने से तबाही आई है।

ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि आखिर बर्फ़ीले पहाड़ पर माइनस टेंपरेचर में इतना बड़ा ग्लेशियर टूटा कैसे? ये सवाल है जिन पर दुनियाभर के वैज्ञानिकों की अलग-अलग थ्योरी को समझना होगा। किसी ने हिमालय के कमज़ोर होती ताक़त के बारे में कहा तो किसी ने ग्लेशियर के अचानक ब्लास्ट होने वाली थ्योरी सामने रखी। इन सारी बातों को समझने के लिए सबसे पहले हिमालय को समझना होगा क्योंकि हिमालय की ताक़त धीरे-धीरे कमज़ोर हो रही है। जिससे इस तरह की आने वाली तबाही को रोकना बहुत मुश्किल है। पहले केदारनाथ और उसके ठीक 7 साल बाद ऋषिगंगा घाटी में आई तबाही। ये साफ इशारा कर रही है कि हिमालय ख़तरे में हैं लेकिन कोई इस ख़तरे को सीरियसली नहीं लेना चाहता है। सबसे ज़्यादा ख़तरे की वाली बात ये है कि जब तक हिमालय के ग्लेशियर इस तरह फटते रहेंगे तब-तब ऐसी तबाही की ख़तरा बना रहेगा। ये डरने की नहीं बल्कि समझने की बात है कि किस तरह हिमालय पर्वत धीरे-धीरे कमज़ोर हो रहा है।

तबाही की क्या है वजह?
इसका पहला कारण हैं ग्लेशियर का लगातार पिघलना और दूसरी वजह है ग्‍लेशियर लेक आउटबर्स्‍ट यानी ग्लेशियर का अचानक टूटना। ये दोनों ही वजह हिमालय पर बढ़ते ग्लोबल वॉर्मिंग के ही पहलू हैं। सबसे पहले आप ये समझिये कि ग्‍लेशियर लेक आउटबर्स्‍ट होता क्या है। जिसकी वजह से उत्तराखंड में ये तबाही आई है। दरअसल हिमालय के बर्फ़ीले इलाकों में करीब 5 हज़ार झीले हैं इन झीलों में ग्लेशियर के छोटे-बड़े टुकड़े टूटकर गिरते रहते हैं। जिससे झील की दीवारों पर प्रेशर बढ़ने लगता है और ज़्यादा प्रेशर की वजह से ये टूट जाती हैं और पानी तेज बहाव अपने साथ सैलाब लेकर आता है और इसकी सबसे बड़ी वजह है ग्लोबल बॉर्मिंग यानी धरती का बढ़ता तापमान है।

जून 2019 में आई साइंस एडवांस जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक 1975 से 2000 के मुकाबले ग्‍लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हुई है। साल 1975 से 2000 के बीच हर साल 10 इंच ग्लेशियर पिघल रहे थे जबकि साल 2000 से 2016 के बीच हर साल ग्लेशियर 20 इंच पिघले। यानी साल 2000 के बाद से हिमालय में हर साल तेजी से बर्फ पिघल रही है। सबसे ख़तरे के बात ये है कि इस दौरान हिमालय में तापमान 1 डिग्री बढ़ गया है और ये तापमान और बढ़ा है तो ये तय है कि तबाही भी और बढ़ेगी। ग्लोबल बॉर्मिंग की वजह से ग्लेशियर की पिघलने और टूटने से हिमालय की तस्वीर लगातार बदल रही है और इससे उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाकों को ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों को नुकसान होगा।

अब ये भी समझ लीजिये कि हमारी ज़िंदगी में हिमालय और उसकी बर्फ के क्या मायने हैं। इसे समझने के लिए हिमालय से निकलने वाली नदियों और मानसून के आने में हिमालय के रोल को समझना होगा। उत्तर भारत की नदियों में हर साल 650 घनमीटर पानी हिमालय से ही आता है। यानी देश में पानी की कुल जरूरत का 60 फीसदी हिमालय से ही मिलता है। इतना ही नहीं हिमालय से निकलने वाली नदियां एशिया महाद्वीप के सभी देशों को 10 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी देती हैं। इन देशों में भारत, चीन, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान जैसे देश आते हैं जिनके करीब 80 करोड़ लोगों की पानी की ज़रूरत पूरी होती है। इतना ही नहीं हमारी खेती मानसून पर टिकी है और मानसून हिमालय से टकराकर बारिश करता है। अगर हिमालय इसी स्पीड से पिघलता रहा तो दक्षिण-पश्चिमी से आने वाले मॉनसून को रोकने के लिए कोई पहाड़ नहीं बचेगा और ये मॉनसूनी हवाएं मध्य एशिया की तरफ चली जायेंगी कुल मिलाकर हिमालय इन हवाओं के सामने एक दीवार सा खड़ा है जिससे मैदानी इलाकों में बारिश होती है। यानी हिमालय का पिघलना हमारी ज़िंदगी के पिघलने जैसा है अगर इसे नहीं रोका गया तो तबाही ये तबाही रुकने वाली नहीं है। वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा चैलेंज यही है कि हिमालय को पिघलने से कैसे रोका जाये।

तमाम रिपोर्ट बताती हैं कि इस सदी के आख़िर तक उत्तराखंड के 70 फ़ीसद ग्लेशियर पिघल जाएंगे। उत्तराखंड के ग्लेशियर इस वजह से भी ख़तरे में हैं क्योंकि ब्लैक कार्बन का असर लगातार बढ़ रहा है। प्रदूषण और जंगलों में आग की घटनाएं इसकी बड़ी वजह हैं। हिमालय में बर्फ पिघलने का कारण भी हम ही हैं। हिमालय के आसपास आने वाले एशिया महाद्वीप के देश 60 फीसदी बिजली कोयले से पैदा करते हैं। इससे निकली ग्रीन हाउस गैसों ने हिमालय की आबोहवा बिगाड़ दी है। ब्लैक कार्बन के असर से ग्लेशियर की बर्फ तेज़ी से पिघलती है। ऐसा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड दोनों जगह रिसर्च से पता चला है कि लगातार ग्रीन हाउस गैसों का बढ़ता दबाव भी इसकी एक वजह है। इसलिये चमोली में जो हुआ…वो उत्तराखंड के लिये एक बहुत बड़े अलार्म की तरह है। जिस रफ़्तार से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उसमें ज़्यादा ख़तरा छोटे ग्लेशियर से है। जैसा कि चमोली में हुआ है

उत्तराखंड के गंगा बेसिन में छोटे-बड़े 968  ग्लेशियर हैं। जो क़रीब दो हज़ार 850 वर्ग किलोमीटर का इलाका कवर करते हैं। सिर्फ़ अलकनंदा बेसिन में ही 407 ग्लेशियर हैं। छोटे ग्लेशियर जैसे पिंडारी ग्लेशियर 15 मीटर प्रति साल की दर से पिघल रहा है। जबकि गंगोत्री ग्लेशियर 8 मीटर प्रति साल की दर से पिघल रहा है। उत्तराखंड जैसी स्थिति हिमाचल में भी आ सकती है। इसकी पूरी आशंका है, क्योंकि हिमाचल प्रदेश में भी छोटे ग्लेशियर बहुत तेज़ी से पिघल रहे हैं। यानी ख़तरा अब भी हिमालय पर मंडरा रहा है। जिसका अंजाम और भयानक हो सकते हैं।

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