चाय की चुस्की का अपना ही आनंद है। सिर्फ भारत में ही लोग चाय के दीवाने नहीं, बल्कि यूरोपीय देशों में भी बड़ी तादाद में लोग चाय पीना काफी पसंद करते हैं।

खास बात ये कि यूरोपियन देशों के लोगों को उत्तारंखड के चंपावत की चाय काफी पसंद है। वहां के लोग चंपावत की जैविक चाय की चुस्की से अपने को तरोताजा महसूस करने लगे हैं। यूरोपियन देंशों में यहां की चाय की डिमांड बढ़ने के बाद यहां चंपावत में लोगों ने चाय का उत्पादन भी बढ़ा दिया है। पिछले दो सालों में यहां 34,300 किलो का उत्पादन हुआ है। 17 ग्राम पंचायतों के 161 हेक्टेयर में चाय की खेती लहलहाने लगी है। डिमांड बढ़ने से चंपावत के लोगों को दो फायदे हो रहे हैं पहला तो ये कि उनकी आय बढ़ गई है। दूसरा ये कि हर दिन करीब 400 मजदूरों को रोजगार मिल रहा है।

आपको बता दें करीब 200 साल पहले जब अंग्रेज चंपावत आए थे तब उन्होंने चाय की खेती शुरू कराई थी। हालांकि रखरखाव के अभाव में खेती उजड़ने लगी। नब्बे के दशक में शासन की तरफ से इस पर ध्यान दिया गया और चाय के बागान को बढ़ावा देने के मकसद से टी बोर्ड के गठन के बाद साल 1995-96 से दोबार पहाड़ी इलाकों में चाय विकास योजना को लागू करने की कोशिश की गई। इसके बाद से ही धीरे-धीरे तरक्की हुई और अब बड़ी तादाद में यहां चाय की खेती होती है। शुरुआत में टी-बोर्ड चाय के पौंधों का रोपण करने के साथ ही तीन साल तक लगातार इसकी देखभाल करता है इसके बाद भूमि स्वामी को पूरा स्वामित्व दे दिया जाता है। टी-बोर्ड की कोशिशों का नतीजा है कि पिछले दो सालों में यहां 34,300 किलो की एक्सपोर्ट क्वालिटी की जैविक चाय का उत्पादन हुआ। इस साल अप्रैल महीने तक 5,500 किलो का उत्पादन हुआ है।

चाय के बाद भले ही चंपावत में लगे हैं, लेकिन इसकी मार्केटिंग कोलकाता में होती है। पैरा माउंट मार्केटिंग कंपनी इस चाय को खरीदता है, इसके बाद इसे जर्मनी, इग्लैंड समेत यूरोपियन देशों में भेजा जाता है। फिलहाल चाय की बिक्री दर प्रति किलो 350 से 400 रुपए है।

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